Saturday, September 10, 2011

गंगेया, बागमती और बाढ़


प्रसिद्ध रचनाकार रामबृक्ष बेनीपुरी का गांव बेनीपुर इतिहास के पन्नों में खो गया। स्वतंत्रता सेनानियों का गढ़ संयुक्त बिहार विधानसभा के प्रथम अध्यक्ष स्व0 राम दयालु सिंह, भारत के प्रथम राश्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद के मित्र, विधायक स्व0 मथुरा प्रसाद सिंह, स्वतंत्रता सेनानी स्व0 ब्रह्मदेव सिंह, प्रसिद्ध अर्थषास्त्री प्रो0 अजीत प्रसाद सिंह, समाजिक कार्यकर्ता चन्द्रकांत मिश्र, दिग्विजय सिंह और दिलीप सिंह का गांव गंगेया गंगेया अपना अस्तित्व खोने के कगार पर है। कारण - बिहार सरकार-बागमती के बहाव को नियंत्रित करना चाहती है।

सन् 1977 से बागमती पर बांध निर्माण रूका हुआ था, लेकिन नितीष सरकार की अतिसक्रियता से यहां फिर से बांध निर्माण षुरू हो गया है। बड़े बांधों की उपादेयता अभी भी विवादास्पद है। बिहार में कोषी नदी परियोजना अभी तक चल रही है इसके बावजूद सरकार ने बागमती को बांधने का कार्य तेज कर दिया है और सरकार की इस जिद की कीमत चुकाएगा आम आदमी।

बागमती बांधने की तैयारी तो हो गई लेकिन जल भराव क्षेत्र में आने वाले लोगों के समुचित विस्थापन की कोई योजना अभी तक नहीं बनी है। मुजफ्फरपुर और सीतामढ़ी जिले के सैकड़ों गांवों के हजारों लोग बेहाल हैं। सब कुछ किस्मत के हवाले हैं। संपन्न किसान तो कहीं भी ठिकाना ढूंढ लेंगे लेकिन आम आदमी क्या करे। उनकी आवाज की कहीं कोई सुनवाई नहीं है।

बात केवल डूब क्षेत्र की ही नहीं है। इस बांध के बनने से कई और समस्याएं खड़ी हो गई है। छोटे-मोटे, नदी-नाले जो बागमती की षक्ति बढ़ाते थे उन्हें बांध कर बागमती में जाने में रोक दिया गया। परिणाम सामने है - नेपाल से आने वाली ‘मानुशमारा’ नदी को बागमती में मिलाने से रोक दिया गया तो सीतामढ़ी जिले के रून्नी सैदपुर क्षेत्र में तकरीबन दस हजार हेक्टेयर जमीन दलदल में तब्दील हो गई।

अब ये दलदल सैकड़ों तरह की बीमारियों का जनक है। ये जगजाहिर तथ्य है कि बड़ी नदियों को बांधने से कालाजार, मलेरिया, मेनेन्जाईटिस, जापानी बुखार जैसी बीमारियां फैलती हैं। मच्छर-मक्खियों का प्रकोप भी बढ़ेगा। ये तथ्य दामोदर घाटी परियोजना पर नोबल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक सर रोनाल्ड रोस के अध्य्यन से स्पश्ट है।

बिहार वर्शों से बाढ़ की विभिशका से जूझ रहा है। हर साल लाखों लोग इससे प्रभावित होते रहे हैं और अरबों की संपत्ति बर्बाद हो जाती है। कई अध्य्यनों में विषेशज्ञों ने बिहार में बाढ़ की वजह बांध को बताया है। फिर भी ठेकेदार, ब्यूरोक्रट्स और राजनीतिज्ञों के गठजोड़ की वजह से सत्ता हमेषा से बड़े बांधों के पक्ष में खड़ी दिखती है।

फिलवक्त बिहार सरकार के पास अपने कर्मचारियों को देने के लिए पैसे नहीं है फिर बांधों की देख-रेख कैसे होगी? पहले से ही बाढ़ की समस्या से जूझ रही बिहार सरकार इससे निजात पाना चाहती है या इस समस्या को और बढ़ाना चाहती है - ये तो बता पाना मुष्किल है। लेकिन बिहार सरकार के क्रिया-कलाप से अभी तो यही लगता है कि सरकार बाढ़ की समस्या को सुलझाना नहीं चाहती है। आखिर स्वतंत्रता आंदोलन का गढ़ गंगेयावासी क्या करंे?

Monday, August 8, 2011


प्रिय महोदय / महोदया,

अपनी मशहूर किताब स्माल इज ब्यूटीफुल से विचारों की दुनिया में हलचल मचा देने वाले लेखक अर्नेस्ट फ्रेडरिक शुमाकर का यह जन्म शताब्दी वर्ष है। इस मौके पर 16 अगस्त 2011 को दिल्ली में एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। जिसका विवरण निम्न है –

विषय – वर्तमान संदर्भों में ई एफ शुमाकर के विचारों का महत्व

कार्यक्रम

दिनांक : 16 अगस्त 2011

समय : सुबह 11 बजे

स्थान : राजधानी कॉलेज, ऑडिटोरियम

दिल्ली विश्वविद्यालय

राजा गार्डन, नई दिल्ली

कृपया वक्त पर पधारने का कष्ट करें।

शुभकामनाओं के साथ

जैविक खेती अभियान

फोन 00919213295509 javik@rediffmail.com

Dear Sir/ Madam

We are pleased to inform you that Birth Centenary of Ernst Friedrich Schumacher (Author of Small is Beautiful) - is being celebrated on 16th August, 2011 in Delhi.

Sub: - Significance of E.F. Schumacher’s thoughtSmall is Beautiful- in present Context.

Programme:

Date: 16th August 2011

Time: 11 AM onward

Place: Rajdhani College Auditorium

(University Of Delhi)

Raja Garden, New Delhi

Kindly record it in your engagement diary

With Regards,

Jaivik Kheti Abhiyan(campaign for organic farming)

00919213295509

javik@rediffmail.com

Wednesday, August 3, 2011

Sunday, June 6, 2010

पर्यावरण बचाना होगा

विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर प्रकृति को बचाने की चिंता सेमिनारों और जटिल तकनीकी शब्दावलियों की पृष्ठभूमि में सार्थक परिणति तक नहीं पहुंच रही है। सच तो यह है कि पर्यावरण पर होने वाले बहस के दायरे को अब विकास के कुछ तकनीकी मानदंडों और प्रौद्योगिकी के हेरफेर की बहस से आगे सभ्यतामूलक विमर्श पर ले जाना होगा। सवाल यह उठता है कि हर पर्यावरण दिवस के सालाना जलसे में हमें मर्सिया पढ़ने की जरूरत क्यों होती है? पर्यावरण के क्षय के लिए जिम्मेदार कारक तत्व आखिर कौन से हैं। स्टॉकहोम से लेकर रियो द जेनेरियो और कोपेनहेगेन तक काफी आंसू खर्च करने के बाद मानव जाति पर आसन्न इस संकट के समाधान के बारे में कोई सर्वसम्मति क्यों नहीं बन पा रही है। कल तक केवल कार्बन उत्सर्जन के नाम पर होने वाली बहस की दिशा भी अब काफी भयंकर रुख अख्तियार कर चुकी है। तथाकथित विकास के नाम पर पौधों और जंतुओं की कई प्रजातियां अब तक या तो विलुप्त हो चुकी हैं या खत्म होने के कगार पर पहुंच चुकी हैं। जैव-विविधता पर पैदा हुए इस खतरे ने कई जगह पारिस्थितिकीय असंतुलन की भयानक समस्या पैदा कर दी है। सचाई यह है कि विकास की ओर बढ़ने वाला हमारा हर कदम पर्यावरण के विनाश को निमंत्रण देता है। अब तो विकास नीतियों के पैरोकार यह जुमला दोहराते हुए भी नहीं थकते कि अब पर्यावरण को बचाने के लिए विकास की दिशा तो नहीं मोड़ी जा सकती। कई देशों में तो अब यह बहस भी आम हो गई है कि पर्यावरण का नाश घाटे का सौदा है या फायदे का। शीत या शीतोष्ण कटिबंध से जुड़े देशों में यह तर्क दिया जाने लगा है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमाच्छादित भूमि का बड़ा हिस्सा खाली होगा, जिसका कृषि भूमि के रूप में उपयोग किया जा सकेगा। साथ ही, धूप खिलने के समय में विस्तार होने से एक साल में कई फसलें ली जा सकेंगी। यही वे प्रच्छन्न तर्क हैं, जिनके कारण अब तक समाधान का रास्ता नहीं निकला है। वे आवश्यकताएं ही थीं, जिनका प्रकृति से तालमेल न बिठा पाने के कारण डायनासोर जैसे जीव धरती से खत्म हो गए, और अब ‘जुरासिक पार्क’ जैसी फिल्मों में उनके एनिमेटेड प्रतिरूपों के दर्शन कर हम दांतों तले उंगली दबा रहे हैं। क्या आदमी की महत्वाकांक्षाएं भी इसी दिशा में जा रही हैं? फिर तो हमें अपनी आवश्यकताओं पर अपनी अस्तित्व की रक्षा को तरजीह देनी होगी। बापू ने कभी कहा था कि प्रकृति हर आदमी की जरूरतें तो पूरी कर सकती है, लेकिन किसी एक आदमी का लोभ पूरा नहीं कर सकती। आज हर आदमी प्रकृति के प्रति इस कदर लोभी हो चुका है कि अपने अस्तित्व के लिए जरूरी चीजों को भी खत्म करने को आमादा है । मर्ज पैदा कर औषधि उद्योग के विकास का मार्ग तलाशने वाली व्यापारिक सभ्यता में पर्यावरण के सवाल कभी-कभी तो लोगों को बेमानी से लगते प्रतीत होते हैं। खासकर वाहनों की संख्या पर लगाम लगाने के लिए योजना बनाए बगैर कार्बन उत्सर्जन पर होने वाला विलाप एक विद्रूप भर है। इसलिए पर्यावरण के क्षय और उससे होने वाले मानव जाति के महाक्षय की प्रक्रिया को रोकने के प्रति अगर हम वाकई गंभीर हैं, तो हमें प्रकृति प्रदत्त संसाधनों के धीमे दोहन और उनकी भरपाई के उपायों को विकास के प्रतिमानों में प्राथमिकता के स्तर पर रखना होगा। इसके बगैर बेकार की प्रतिक्रियाओं से न तो पर्यावरण का भला होगा और न मानव का अस्तित्व ही सुरक्षित रह पाएगा।

Sunday, February 21, 2010

बधाई के पात्र हैं जयराम रमेश

उदारीकरण की राह पर तेजी से आगे बढ़ रही केंद्र सरकार से शायद ही किसी को उम्मीद थी कि वह बीटी बैंगन की पैदावार पर रोक लगा सकती है। यही वजह है कि जब केंद्रीय वन एवं पर्यावरण राज्यमंत्री जयराम रमेश ने सरकार के इस फैसले की घोषणा की तो पर्यावरण के क्षेत्र में काम कर रहे कार्यकर्ताओं और भारतीय किसान संघों को अचानक कुछ नहीं सूझा। पहले तो वे भौंचक रहे, क्योंकि इस तरह के फैसले के लिए सही मायने में तैयार ही नहीं थे। लेकिन जब उन्हें लगा कि सचमुच सरकार ने ऐसा कोई फैसला लिया है तो उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। लेकिन लगे हाथों उन्होंने इसे अपनी जीत बताने में भी देर नहीं लगाई।
अर्थशास्त्री जयराम रमेश उदारीकरण के वैसे ही पैरोकार माने जाते रहे हैं, जैसे कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी माने जाते हैं। उदारीकरण की तेजी से बहती बयार को सिर्फ अमेरिकी हवा ही पसंद आती है। अमेरिका की खुशियां, अमेरिकी उपलब्धि और अमेरिकी तैयारी उदारीकरण के पैरोकारों को अपनी खुशी, अपनी उपलब्धि और अपनी तैयारी नजर आने लगती है। यही वजह है कि बीटी बैंगन के उत्पादन को भारत में भी मंजूरी मिलने की उम्मीदें लगाई जा रही थीं। किसानों के संगठन और पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाएं इसे लेकर सशंकित थीं। इसे लेकर रतलाम से लेकर बिहार तक में आंदोलन शुरू हो गए थे। किसानों को आपत्ति थी कि इससे भारतीय प्रजाति के बैंगन का खात्मा हो जाएगा। साथ ही भारतीय स्वास्थ्य और पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचा सकता है। लेकिन जैविक रूप से बदले जा चुके इस बैंगन के पैरोकारों को दावा है कि इससे ना सिर्फ पैदावार बढ़ेगी, बल्कि इसके उत्पादन में कीटनाशकों का ज्यादा इस्तेमाल नहीं करना पड़ेगा। लेकिन इस विवाद का अंत नजर नहीं आ रहा था। इसे लेकर जयराम रमेश ने जन संगठनों, स्वयंसेवी संगठनों और किसानों से चर्चा शुरू की। उन्होंने खुद बताया कि भारत में हरित क्रांति के जनक माने जाने वाले मशहूर कृषि वैज्ञानिक एम एस स्वामीनाथन से तीन दौर की बातचीत की। इसके बाद इसके उत्पादन को मंजूरी देने से फिलहाल इनकार कर दिया।
उदारीकरण में चर्चाओं और बातचीत को नजरंदाज करने की परंपरा सी बन गई है। ऐसे में में जयराम रमेश ने अगर ऐसा कदम उठाया तो निश्चित तौर पर वे प्रशंसा के पात्र हैं। इन चर्चाओं और बहस-मुबाहिसों के दौरान उन्हें खुलेआम खरीखोटी भी सुननी पड़ी है तो दूसरों को खरीखोटी सुनाने में वे भी खुद पीछे नहीं रहे। लेकिन उन्होंने आखिरकार एक क्रांतिकारी फैसला लेने का साहस दिखाया है तो इसके लिए उनकी प्रशंसा करने से गुरेज नहीं होना चाहिए।
यह सच है कि आनुवंशिक रूप से संवर्धित यानी बीटी बैंगन का फिलहाल दुनिया में कहीं भी उत्पादन नहीं हो रहा है। अगर भारत इसकी मंजूरी देता तो वह दुनिया का पहला ऐसा देश बनता। लेकिन यह ऐसा मसला नहीं है, जहां रिकॉर्ड बनाने की जरूरत है। बल्कि देश के स्वास्थ्य के साथ ही पर्यावरण की समस्या से भी जुड़ा ये मामला है। ऐसे में उम्मीद तो यही की जानी चाहिए कि केंद्र सरकार अपने इस फैसले पर बाद में भी कायम रह सकेगी।

इसे देखते हुए जयराम रमेश ने जनसंगठनों, पर्यावरण और खेती के क्षेत्र में काम कर रहे कार्यकर्ताओं के साथ ही देश में हरित क्रांति के जनक माने जाने वाले मशहूर कृषि वैज्ञानिक एम एस स्वामीनाथन से चर्चा की। इस चर्चा के बाद उन्होंने फिलहाल देश में बीटी बैंगन के उत्पादन को मंजूरी देने से मना कर दिया है। जयराम रमेश का कहना है कि चूंकि बीटी बैंगन को लेकर फ़िलहाल पर्याप्त वैज्ञानिक अध्यययन नहीं हुए हैं और इस समय बीटी बैंगन के व्यावसायिक अध्ययन के लिए जल्दबाज़ी की कोई वजह भी नहीं है इसलिए फ़िलहाल इसे अनुमति नहीं दी जा रही है.
मुझ पर दबाव में आने का आरोप लगाया जा सकता है लेकिन यह सोच समझकर, ज़िम्मेदारी के साथ लिया गया पारदर्शी निर्णय है

उन्होंने कहा, "भारत दुनिया का पहला देश होता जो बीटी बैंगन के व्यावसायिक उत्पादन की अनुमति देता इसलिए इस पर बहुत एहतियात की ज़रुरत थी."

Wednesday, September 23, 2009


कोपेन हेगन में होगी असली परीक्षा

सन् 1972 में स्टॉकहोम में संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वाधान में मानव वातावरण पर एक सम्मेलन हुआ था। सबसे पहले यहीं बदलते पर्यावरण पर विचार-विमर्श हुआ, फिर 1992 में रियो द जनेरो में अर्थ समिट हुआ जहां पर्यावरण को लेकर चिंता जाहिर की गई और यह माना गया कि कार्बन उत्सर्जन में कमी नहीं की गयी तो इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। इस दौरान बैठकों का दौर चलता रहा और अब आने वाले दिसंबर में कोपेन हेगन में जलवायु परिवर्तन को लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ का सम्मेलन होने जा रहा है।
उम्मीद की जाती है कि उस सम्मेलन में कार्बन उत्सर्जन को लेकर कोई न कोई समझौता हो ही जाएगा और शायद भारत को भी उस समझौते पर दस्तखत करना पड़े। सवाल है कि क्या भारत कार्बन उत्सर्जन में उतनी कमी को तैयार है जितना विकसित देश चहते हैंर्षोर्षो और अगर नहीं तो फिर विकल्प क्या हैर्षोर्षो क्या इसके लिए भारत ने कोई तैयारी भी की हैर्षोर्षो जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाओं और समाचार माध्यमों के जरिए जो सूचनाएं मिल रही हैं उससे ऐसा नहीं लगता कि भारत के पास कोई वैकल्पिक योजना है। आंकड़ों के मुताबिक भारत प्रति व्यक्ति सिर्फ एक टन कार्बन का उत्सर्जन करता है जबकि अमेरिका 24 और कनाडा 23 टन। ईरान जैसा देश भी प्रति व्यक्ति सात टन कार्बन उत्सर्जन करता है। जाहिर है विकास और कार्बन जनित ईंधन का सीधा रिश्ता है। इसके बावजूद विकसित देश चाहते हैं कि विकासशील देश कार्बन उत्सर्जन में कटौती करें। इसका मतलब यह हुआ कि भारत को कार्बन उत्सर्जन में कमी के समझौते पर हस्ताक्षर करना ही पड़ेगा और वह भी विकसित देशों के कहने के मुताबिक। कहने की आवश्यकता नहीं कि इसका भारत के विकास पर नकारात्मक असर पड़ेगा क्योंकि कार्बन उत्सर्जन में कमी का सीधा मतलब है ऊर्जा की खपत में कटौती। सवाल है, भारत के सामने विकल्प क्या हैर्षोर्षो एक उपाय तो यह है कि भारत तत्काल इस समझौते पर हस्ताक्षर नहीं करे। सरकार यह तर्क दे सकती है कि इसके लिए जरूरी तैयारी करने के लिए भारत को वक्त चाहिए। ऐसा किया जा सकता है और संभव है कि चीन भी यही करे। विश्व व्यापार संगठन के मामले में चीन ऐसा कर चुका है। हम यह देख चुके हैं कि चीन ने विश्व व्यापार संगठन पर तभी हस्ताक्षर किए जब उसने इसके कुप्रभावों से बचने के उपाय कर लिए। गौरतलब है कि दिसंबर 2001 मे आकर चीन डब्ल्यूटीओ का सदस्य बना। लेकिन भारत ऐसी हिम्मत नहीं दिखा पाया और हमारे लोग विश्व व्यापार संगठन के बारे में जाने-बूझे बिना उस पर दस्तखत कर आए जिसका परिणाम हमें आज तक भोगना पड़ रहा है। इसलिए जलवायु परिवर्तन के समझौते पर दस्तखत ना करने की हिम्मत भारत दिखा पाएगा कहना मुिश्कल है। दूसरा उपाय यह है कि भारत कार्बन उत्सर्जन कम करने पर सहमत हो जाए और समझौते पर हस्ताक्षर कर दे। कहने की बात नहीं कि कार्बन उत्सर्जन घटाना एक चुनौती होगी। ऐसे में सरकार के पास क्या विकल्प होंगे और किन तरीकों से कार्बन उत्सर्जन घटाया जाएगार्षोर्षो इस मामले में सरकार के विशेषज्ञ क्या कहते हैं यह साफ नहीं है लेकिन कठिन पर सबसे कारगर विकल्प यह है कि शहरीकरण की आंधी पर लगाम लगायी जाय। जब हम शहरीकरण पर लगाम लगाने की बात करते हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि शहरों को दी जाने वाली सुविधा में कटौती कर उन्हें तबाह कर दिया जाय। बदले हालात में ऐसी व्यवस्था की जाए ताकि शहरों के बेतरतीब विकास और गांव से शहरों की ओर पलायन पर रोक लगे। इसके लिए होना यह चाहिए कि छोटे-बड़े कस्बों और ग्रामीण इलाकों में नागरिक सुविधाएं उपलब्ध कराने पर ध्यान दिया जाए। पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने इसे `पूरा´ यानी प्रोवाईड अर्बन एमिनिटीज इन रूरल एरियाज कहा था। नागरिक सुविधाओं में भी बिजली, पानी और यातायात के साधन यानी सड़कों और आधारभूत सुविधाओं के विकास पर विशेष जोर देने की जरूरत है। कुल मिलाकर ग्रामीण इलाकों में ऐसी अर्थव्यवस्था विकसित करने की जरूरत है जो पूरी तरह से आत्म-निर्भर हो खासकर मूलभूत आवश्यकताओं के मामले में। यानी वहां का उत्पाद आसपास के इलाक में ही खप जाए। स्थानीय लोगों को रोजी-रोटी के लिए बड़े शहरों का रूख ना करना पड़े। सीधे-सीधे कहें तो हमें ऐसी अर्थव्यवस्था विकसित करने की कोशिश करनी चाहिए जिसमें परिवहन पर फूंके जाने वाले ईंधन को बचाने पर जोर हो। साथ ही हमें भोगवाद की प्रवृत्ति पर भी लगाम लगानी होगी। इसके पीछे तर्क यह है कि दुनिया भर में सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन माल ढोने वाले वाहनों और एसयूीव यानी स्पोर्ट युटिलिटी वाहनों के कारण होता है। कमोबेश भारत के संदर्भ में भी यह उतना ही सही है क्यांकि यहां अमेरिका या किसी और विकसित देश के मुकाबले एसयूीव और एसी, फि्रज भले ही कम हो पर जरूरी सामान और लोगों के परिवहन पर काफी ईंधन खर्च होता है। शहरों मंें बढ़ती भीड़ के कारण बरबाद होने वाले ईंधन का भी दुनिया का तापमान बढ़ाने में खासा योगदान है। इसलिए यूरोप में `हंड्रेड मायल डायट´ का नारा दिया जा रहा है और कई देशों मेें उस पर अमल भी हो रहा है। `हंड्रेड मायल डायट´ का मतलब है कि आसपास के सौ मील के दायरे में उत्पादित सामान या खाद्यान्न का ही उपयोग किया जाए। यानी अनाज और अन्य खाद्य वस्तुओं के बाहर या कहें कि लंबी दूरी से आयात से परहेज किया जा रहा है। भारत में भी कुछ ऐसा ही करने की जरूरत है। सरकार को यह नियम बना देना चाहिए कि एक राज्य से दूसरे राज्य में अनाज और बाकी जरूरी खाद्यान्न तभी लाया ले जाया जायए जब वहां उस अनाज की कमी हो। इसके लिए स्थानीय स्तर पर अनाजों की खरीद और भंडारण व्यवस्था करनी होगी। इसके अलावा एसी, फि्रज और एसयूवी पर मोटा टैक्स लगाने की जरूरत है। पृथ्वी के गरमाते मिजाज को लेकर दुनिया गंभीर है और जापान ने तो कार्बन उत्सर्जन में कटौती की शुरूआत भी कर दी है। हमारे पास ज्यादा समय नहीं है इसलिए कोपेन हेगन में होने वाले सम्मेलन के बारे में तत्काल सोचने की जरूरत है। बेहतर तो यही होगा कि देश में पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाओं और लोगों का एक सम्मेलन बुलाया जाए। इस बारे में सरकार को ही पहल करनी हागी। इस सम्मेलन के जरिए सरकार को कुछ जरूरी सुझाव मिल सकते हैं। इस तरह व्यापक विचार-विमर्श के बाद ही कार्बन उत्सर्जन कम करने के मामले में आगे बढ़ा जाए तो बेहतर होगा। पर क्या देश के बाबू लोग जागेंगे?

Saturday, June 27, 2009

खेती खेत रहे इससे पहले

27 June, 2009 क्रांति प्रकाश
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समय आ गया है कि हम इस कथित वैज्ञानिक या आधुनिक खेती की सार्थकता पर फिर से विचार करें और देर होने से पहले भारत में हजारों साल से प्रचलित जैविक (देसी) खेती की ओर लौट चलें। भारत के संदर्भ में जब हम जैविक खेती की बात करते हैं तो इसका मतलब एक ऐसी कृषि व्यवस्था से है जो मोटे तौर पर आत्मनिर्भर रहा है जहां खाद-बीज से लेकर तमाम साधन स्थानीय स्तर पर ही उपलब्ध हो जाता है। चूंकि पारम्परिक खेती में बाजारू चीजों का उपयोग न के बराबर होता है इसलिए इसमें लागत भी कम आती है।
पिछले कुछ वर्षों में तो आए दिन हमें सुनने और पढ़ने को मिलता है कि अमुक इलाके के अमुक किसान ने कर्जा देनेवालों से तंग आकर जान दे दी। लेकिन मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले से जो खबरें आ रहीं हैं वह और भी चिंताजनक है। खबरों के मुताबिक होशंगाबाद के कुर्सीढाना प्रखंड के कुछ किसानों ने पिछले दिनों आत्महत्या कर ली। इन किसानों ने गेहूं उगाने के लिए बैंक से कर्ज लिया था लेकिन उत्पादन काफी कम हुआ और वह लागत भी नहीं निकाल पाये। खराब फसल और गिरवी जमीन से टूटे किसानों ने जान देकर छुटकारा पा लिया। किसानों की आत्महत्या के मामले में यह एक नया मोड़ है, क्योंकि अब तक यही माना जाता रहा है कि कपास जैसी नकदी फसल उगाने वाले किसान ही कर्ज के जाल में फंसते हैं। लेकिन होशंगाबाद की घटना से साफ है कि गेहूं जैसी फसल उगाने वाले किसान भी, कर्ज की चपेट में आकर जान देने को मजबूर हो रहे हैं। जाहिर है, हरित क्रांति के नाम पर बाजारू खाद, बीज के साथ डीजल फूंक कर की जाने वाली खेती अब भारी पड़ने लगी है।
दरअसल वैज्ञानिक या आधुनिक खेती के नाम पर पिछले कुछ दशकों में देश के किसानों को जिस राह पर धकेला गया, उसका आज नहीं तो कल यही अंजाम होना था। आज जिस तरह की खेती की जा रही है, उसके लिए जरूरी बीज, रासायनिक खाद और कीटनाशक समेत सब कुछ बाजार से खरीदना पड़ता है। सरकार कितनी भी सब्सिडी दे इन चीजों की कीमतें कम नहीं होती। फिर सिंचाई के लिए इतना पानी चाहिए कि यह बोरिंग या नलकूप के बिना संभव नहीं है। पानी भले ही जमीन या नहर से मिल जाए, उसे निकालने और खेतों तक पहुंचाने में अच्छा-खासा पैसा लगता है। बिजली के अभाव में पंप सेट चलाने के लिए डीजल का ही सहारा लेना पड़ता है और उसमें भी पैसा ही फूंकना पड़ता है। इतना सब करने के बाद भी फसल अच्छी होगी, इसकी कोई गारंटी नहीं।
कुल मिलाकर इस खेती में लागत इतनी ज्यादा है कि भारत के ज्यादातर छोटे और मंझोले किसानों के लिए इसका खर्च उठाना संभव नहीं है। ऐसे में स्थानीय साहूकार और बैंक ही इनका सहारा बनते हैं और कुछ दिनों बाद मौत का कारण भी। सच तो यह है कि बढ़ती आबादी का पेट भरने के लिए अनाज का उत्पादन बढा़ने की दलील देकर आधुनिक कृषि के पैरोकारों और सरकार ने खेती की जिस पद्वति को आगे बढा़या, वह मूलत: बाजार और साहूकारों के लिए ही फायदेमंद साबित हुआ है। आम किसानों के लिए तो यह घाटे का कारोबार है। इसलिए कल तक खेती के सहारे खुशहाल जिंदगी जीने वाला परिवार आज खेती से भाग रहा है। शायद इसीलिए हरित क्रांति की वकालत करने वाले आज सदाबहार हरित क्रांति की बात कर रहे हैं।
बहरहाल, कचोटने वाली बात यह है कि हरित क्रांति के पैरोकारों में से किसी ने भी किसानों को यह नहीं बताया कि इस खेती में लागत साल दर साल बढ़ती जाएगी और उत्पादन घटता जाएगा। फिर एक समय ऐसा भी आएगा जब उस जमीन में कितना भी खाद-पानी डालो उत्पादन उतना ही रहेगा यानि उपज बढे़गी नहीं। क्योंकि मिट्टी की उर्वरता भी साल दर साल घटती ही जाएगी और कुछ सालों बाद उस जमीन पर घास उगाना भी मुिश्कल हो जाएगा। आज पंजाब और हरियाणा में कुछ ऐसा ही हाल है क्योंकि कीट-पतंगों से फसलों को बचाने के नाम पर की जाने वाले कीट नाशकों के छिड़काव ने घोंघा और केंचुए का नामो-निशान मिटा दिया है जो मिट्टी को नया प्राण देते हैं। इससे होने वाला जल प्रदूषण एक अलग समस्या है।
जैविक खेती को लेकर एक बडी़ गलतफहमी यह है कि इसमें उपज काफी कम होती है, जबकि वास्तविकता कुछ और है। असल में होता यह है कि आधुनिक खेती से बर्बाद हो चुके खेत में जब पारंपरिक तरीके से खेती की जाती है तो शुरूआत में उपज काफी कम होता है, जो स्वाभाविक है। चूंकि रासायनिक खाद से ऊसर हो चुकी जमीन को गोबर की खाद से आबाद होने में थोडा़ समय लगता है इसलिए ऐसी धारणा बन गई है कि जैविक खेती से उत्पादन कम होता है। असल में दो-तीन साल बाद पारंपरिक खेती में भी उतना ही अनाज उपजाया जा सकता है जितना महंगे खाद-बीज और हजारों गैलन पानी झोंक कर उपजाया जा रहा है। पारंपरिक खेती में फसलों का चुनाव बाजार के लिए न होकर खेत और पर्यावरण को ध्यान में रखकर किया जाता है ताकि मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी न हो और नमी बनी रहे। इसलिए जैविक खेती में पानी का इस्तेमाल भी हिसाब से ही होता है। वास्तव में जैविक खेती भारतीय कृषि व्यवस्था का अनिवार्य अंग रहा है।
लेकिन यह रातो रात नहीं होगा और न ही सरकार के सहयोग के बिना होगा। इसके लिए सबसे पहले पशुधन पर ध्यान देना जरूरी है। क्योंकि कभी दूध-दही के मामले में संपन्न माने जाने वाले गांवों को भी अब पाउच वाले दूध का इंतजार रहता है। ऐसा इसलिए हुआ कि रासायनिक खाद की उपयोगिता पर जोर ने पशुपालन को हीन कार्य बना दिया। सरकार को चाहिए कि वह खाद पर दी जाने वाली 80 हजार करोड़ रूपये की सिब्सडी खत्म कर, गाय या भैंस पालने वाले खेतिहर को सीधे आर्थिक सहायता दे। यूरोप और अमेरिका के ज्यादातर देशों में पशु पालने वालों को सरकार प्रतिदिन के हिसाब से दो यूरो या डॉलर की आर्थिक मदद देती है। भारत में भी इसी तरह से आर्थिक सहायता दी जानी चाहिए। अगर यह एक गाय या भैंस पर 100रु प्रतिदिन भी हो तो ज्यादा नहीं है। ऐसा में इसलिए कह रहा हूं कि आज खाद-बीज, कीटनाशक और सिंचाई के लिए बिजली या डीजल पर सिब्सडी के रूप में जितना रूपया झोंका जाता है उससे कम में ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि जी उठेगी। इस तरह शहर की ओर पलायन पर भी काफी हद तक लगाम लगायी जा सकेगी।
इसके अलावा देश के सभी जिलों में प्रखंड स्तर पर बीज बैंक खोला जाना चाहिए, जहां किसान बीज सुरक्षित रख सके और अगर उसके पास बीज नहीं है तो वह मनचाही फसल का बीज खरीद सके। इससे किसानों को हाईब्रिड बीजों से छुटकारा मिल जाएगा। पारंपरिक बीज की यह खासियत होती है कि इसे कई सालों तक सुरक्षित रखा जा सकता है। बीज बैंक इसलिए भी जरूरी है कि इससे जैव विविधता बनी रहेगी।
इस तरह अगर सरकार इच्छाशक्ति दिखाए तो भारत की पारंपरिक खेती का कायाकल्प हो सकता है। दिक्कत यह है कि हरित क्रांति के पैरोकार खाद और बीज वाली कंपनीयों के साथ मिलकर जो शोर मचाएंगे उससे निबटने की हिम्मत सरकार दिखा पाएगी यह कहना मुिश्कल है। लेकिन इतना तय है कि भारतीय कृषि तभी पटरी पर लौटेगी जब हम अपनी पारंपरिक यानि जैविक खेती की ओर लौटेंगे।

Tuesday, June 23, 2009


खाद्य सुरक्षा के लिए जरूरी है जैविक खेती

दिल्ली में आयोजित जैविक खेती अभियान का सम्मेलन
मॉनसेंटों जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बीजों और खाद से हो रही खेती के दुष्परिणाम देश के हर इलाके में दिखने लगे हैं। हर साल पंजाब और हरियाणा में भूजल का स्तर लगातार नीचे जा रहा है। इसके जरिए होने वाली खेती की खाद-पानी और कीटनाशकों की भूख लगातार बढ़ती जा रही है।
डंकेल प्रस्तावों के बाद 1993 में इसके विरोध में राजनीतिक दलों ने इसके खिलाफ सवाल उठाए थे। उनकी चिंताओं में ये समस्याएं भी थीं। लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि कम से कम सियासी दलों के लिए ये चिंताएं सिरे से ही गायब होती जा रही हैं। ऐसे में जैविक खेती अभियान के संस्थापक क्रांति प्रकाश ने जब राजधानी दिल्ली में पांच और छह जून को खाद्य सुरक्षा को लेकर सम्मेलन आयोजित किया तो ये उम्मीद कम ही थी कि राजनीति की दुनिया से लोगों की शिरकत हो। लेकिन सीपीआई के वरिष्ठ नेता और अखिल भारतीय किसान महासभा के महासचिव अतुल कुमार अनजान, मुजफ्फरपुर से जनता दल यूनाइटेड के सांसद कैप्टन जयनारायण निषाद और आंध्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव के यादवरेड्डी ने जब पसीना और उमस से भरे सम्मेलन हॉल में घंटों तक शिरकत की तो ये उम्मीद जरूर बंध गई कि आने वाले दिनों में देश की खाद्य सुरक्षा की चिंताओं से सियासी दल अलग नहीं रहेंगे। क्रांति प्रकाश ने अपने शुरूआती भाषण में जिक्र किया कि ये सच है कि रासायनिक खादों और कीटनाशकों के सहारे हम देश की जरूरत के लिए अन्न उपजा रहे हैं। लेकिन पर्यावरण और अपने परिस्थितिकी तंत्र को इसके लिए जो कीमत चुकानी पड़ रही है, उसकी भरपाई मुश्किल है। उन्होंने किसानों से आह्वान किया कि देर ना हो जाए, इसके लिए जरूरी है कि वे जल्दी से जल्दी जैविक खेती की ओर लौट आएं।लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या परंपरागत खेती की ओर लौटना इतना आसान है। के यादवरेड्डी, जो खुद भी जैविक खेती अभियान से जुड़े हुए हैं, ने साफ कर दिया कि एकाएक इस खेती की ओर लौटना देश की खाद्य जरूरतों के मुताबिक अन्न उत्पादन में कमी ला सकता है। लिहाजा हमें किसानों के लिए ऐसा उपाय खोजना होगा ताकि हम अपने परिस्थितिकीय संतुलन को बचाए और बनाए रखते हुए देश की करीब सवा अरब जनसंख्या का पेट भरने का भी इंतजाम कर सकें। अतुल अनजान ने तो सम्मेलन में अर्जुन सेन गुप्ता कमेटी की रिपोर्ट का जिक्र करते हुए सवाल ही उछाल दिया कि देश के लिए ज्यादा जरूरी उन करीब चौरासी लाख लोगों का पेट भरना है या फिर जैविक खेती की ओर लौटना। मनमोहन सरकार द्वारा गठित अर्जुन सेन गुप्ता कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि देश की करीब 83 करोड़ 65 लाख जनसंख्या रोजाना बीस रूपए से भी कम कमाई कर पाती है। हालांकि अतुल अनजान ने जैविक खेती की संभावनाओं और जरूरत को नकारा भी नहीं। लेकिन ये भी सच है कि अगर सरकारें किसानों को जैविक खेती के चलते दो-चार साल तक होने वाले नुकसान की भरपाई और देश को खिलाने के लिए अन्न का इंतजाम कर सकें तो किसान फिर से परंपरागत खेती की ओर लौट सकते हैं। उन्होंने साफ कर दिया कि इस पर ध्यान दिए बिना जैविक खेती की ओर किसानों की वापसी आसान नहीं होगी। लेकिन जयपुर के मोरारका फाउन्डेशन के शुभेंदु दास ने इस बात से इनकार किया कि जैविक खेती में उत्पादन कम होता है। अपने अनुभवों की चर्चा करते हुए शुभेंदु ने कहा कि वास्तव में जैव उत्पाद देखने में छोटे या कम जरुर लगते है लेकिन उनका वजन ज्यादा होता है.ऐसा नहीं कि जैविक यानी परंपरागत तरीके से खेती हो नहीं रही है। लेकिन इससे पैदा हो रही फसलों का बाजार नहीं है। सम्मेलन में राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, बिहार, झारखंड हरियाणा और उत्तरप्रदेश समेत कई राज्यों से आए किसानों का यही सवाल था। किसानों का ये सवाल भी सही है। लेकिन ये भी सच है कि आज महानगरों में जैविक खेती के उत्पाद फैशन और लाइफ स्टाइल से जुड़ते जा रहे हैं। इसमें कभी गांधीजी की सादगी की प्रतीक रही खादी और फैब इंडिया जैसे देसी ब्रांड भी मददगार साबित हो रहे हैं। और प्रचार भी इसी का हो रहा है। पत्रकार उमेश चतुर्वेदी इस परिपाटी पर सवाल उठाने से नहीं हिचके। उनके मुताबिक पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के गांवों में रासायनिक खाद और कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल से हो रहे दुष्प्रभावों से निकलने के लिए किसान फिर से परंपरागत खेती की ओर लौट रहे हैं। उन्होंने अपने गांव और आसपास में इसके चलते हो रहे बदलाव का जिक्र करते हुए कहा कि अब सवर्ण लोग अपने खेतों में दलित वर्ग से अपनी भेंड़ें और सूअर रात-रात भर तक ठहराने के लिए गुजारिश करने से गुरेज नहीं कर रहे। उन्होंने कहा कि मीडिया में इन प्रयासों को उचित जगह मिलनी चाहिए।गुजरात की अमित ग्रुप ऑफ़ कंपनीज के अमिताभ के सिंह ने भी इस मसले पर सरकार और नीति निर्धारकों का ध्यान जैविक खेती की ओर खींचने की जरुरत पर जोर दिया। जैविक खेती को लेकर गुजरात में काम कर रहे अमिताभ के मुताबिक जैविक खेती से अच्छी गुणवत्ता वाला पौष्टिक अन्न और फल उपजाया जा सकता है, वह भी खेत और पर्यावरण को नुकसान पहुचाये बिना। तमिलनाडु में चार सौ एकड़ में जैविक खेती करा रहीं डॉक्टर पवित्रा ने रासायनिक खेती से उपजाए गए अन्न, फल और सब्जियो के कुप्रभावों पर चिंता करते हुए इससे होने वाले नुकसान का सिलसिलेवार जिक्र किया। अमरावती विश्वविद्यालय की डॉक्टर अलका कर्वे ने जैविक खेती को लेकर अपने शोध का जिक्र करते हुए किसानों को बताया कि इस परंपरागत खेती की ओर लौटना हमारी मजबूरी नहीं, वक्त की जरूरत है।दो दिनों तक चले इस सम्मलेन में जैविक खेती के बारे में ज्यादा से ज्यादा लोगों को सही जानकारी देने के लिए काम करने का प्रस्ताव पारित किया गया। जैविक खेती अभियान योजना आयोग को अपनी रिपोर्ट और मांग पत्र भी पेश करने जा रहा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि किसानों की आत्महत्या की राजनीति से जूझ रही राजनीति और देश इस ओर सकारात्मक ढंग से सोचने की जहमत उठाना जरूर शुरू कर सकेगा।